वेदों और कथाओं के गूढ़ संदेश
हमारी पौराणिक कथाएँ रहस्यों से भरी हुई हैं। कुछ कथाएँ गुप्त भाषा (code language) में लिखी गई हैं, तो कुछ में वैज्ञानिक सिद्धांत छिपे हुए हैं। जैसे, विष्णु के दशावतार में सृष्टि, स्थिति और प्रलय का सिद्धांत समाहित है। इसी प्रकार, वेदों में “नासदीय सूक्त,” “हिरण्यगर्भ सूक्त,” और “पुरुष सूक्त” अज्ञेयवाद (theory of agnosticism), ब्रह्मांडीय उत्पत्ति (big bang theory), और विकासवाद (evolution) के सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हैं।
इसलिए, हर कथा को केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि उसके गूढ़ तत्वों और छिपे हुए पहलुओं को भी समझना आवश्यक है।
“कथा”(Storytelling) एक प्राचीन और अनूठी विधि है जो किसी भी विषय को सिखाने और समझाने का प्रभावी माध्यम है। कठिन से कठिन सिद्धांत, सूत्र या विचारधारा को कहानी के रूप में सुनने पर न केवल समझना सरल हो जाता है, बल्कि उसे याद रखना भी सहज हो जाता है।“
श्रीदुर्गासप्तशती: शक्ति साधना का प्रमुख ग्रंथ:
श्रीदुर्गासप्तशती में देवी महिमा का वर्णन किया गया है। इसे शाक्त संप्रदाय का अति विशिष्ट ग्रंथ माना जाता है। यह शक्ति साधना और उपासना का प्रमुख ग्रंथ है। तांत्रिक साधनाओं में से एक मानी जाने वाली यह साधना गुप्त है। इसलिए कहा गया है कि इसे केवल योग्य, निस्वार्थ, और साधना-समर्पित व्यक्तियों के समक्ष ही प्रस्तुत करना चाहिए। अन्यथा, इसके श्लोक साधक के लिए शक्तिहीन हो सकते हैं।
यह भी रोचक तथ्य है कि गुजरात के कुछ संप्रदायों में देवी पूजा निषिद्ध है (जैसे की स्वामिनारायण सम्प्रदाय), फिर भी वे अपने घरों में दुर्गापाठ का आयोजन करते हैं।
श्रीदुर्गासप्तशती में जो युद्ध का मैदान बताया गया है, वह हमारे अपने शरीर और हमारी चेतना को दर्शाता है। इस कथा में जो भी घटनाएँ दिखाई गई हैं, वे हमारे जीवन में आने वाली या होने वाली घटनाओं का प्रतीक हैं। राक्षसों के साथ देवी का संघर्ष हमारे बाहरी और आंतरिक संघर्षों का प्रतीक है, जिसका हम हर रोज़ सामना करते हैं।
श्रीदुर्गासप्तशती को “चण्डीपाठ” भी कहते हैं क्योंकि इसकी शुरुआत “ॐ नमश्चण्डिकायै” से होती है। यह श्रीमर्कण्डेय पुराण के पाँच खंडों में से चौथा खंड है। श्रीमर्कण्डेय पुराण के अध्याय 81 से 93 तक का यह भाग “देवीमाहात्म्य” कहलाता है।
श्रीदुर्गासप्तशती के प्रमुख वक्ता ऋषि मार्कण्डेयजी हैं – जिनका जन्म दसवे त्रेतायुग मे हुआ था – उनके पिता ऋषि मृकण्डु और माता मनस्विनी थी। ध्यान देने योग्य है कि श्रीमर्कण्डेय पुराण में “श्रीदुर्गासप्तशती” का नाम नहीं मिलता; इसे “देवीमाहात्म्य” कहा गया है। इस ग्रंथ में, ऋषि मार्कण्डेयजी ने बताया है कि आठवें मनु सावर्णी – देवी महामाया की कृपा से मनु बने।
श्रीदुर्गासप्तशती का स्वरूप और महत्व
1. वेदों के समकक्ष स्थान: श्रीदुर्गासप्तशती के तीन चरित्र – प्रथम, मध्यम, और उत्तर – क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, और सामवेद के तुल्य माने गए हैं। तीनों मिलकर अथर्ववेद का निर्माण करते हैं।
2. छंदों की अद्भुतता: इसमें चार स्तुतियाँ हैं, जिनके छंद अनुष्टुप, गायत्री, वसंततिलका और उपजाति हैं। इन छंदों में ऐसा प्रभाव है कि पाठ के दौरान वातावरण में उत्साह, श्रद्धा और आनंद की अनुभूति होती है।
3. स्थूल और सूक्ष्म स्तर का प्रभाव:
- स्थूल रूप में यह देवी और असुरों के बीच युद्ध का वर्णन करता है।
- सूक्ष्म स्तर पर यह हमारे जीवन की विभिन्न समस्याओं को संबोधित करता है।
- यह आंतरिक और बाहरी संघर्षों का प्रतीक है, जो मानव जीवन में दैनिक रूप से होते हैं।
4. तांत्रिक दृष्टिकोण: श्रीदुर्गासप्तशती को तांत्रिक साधना के संदर्भ में कुंडलिनी जागरण की यात्रा माना गया है। यह यात्रा मूलाधार चक्र से ब्रह्मरंध्र तक जाती है, जहाँ देवी ऐं (बुद्धि), ह्रीं (ज्ञान), और क्लीं (कर्म) के माध्यम से सभी बाधाओं को दूर करती हैं।
शोध और निष्कर्ष
श्रीदुर्गासप्तशती का रचना स्थल विन्ध्य पर्वत के पास रेवा नदी का तट माना जाता है। अध्याय 11 के श्लोक 39-41 में कहा गया है कि वैवस्वत मन्वंतर के 28वें युग में शुम्भ-निशुम्भ नामक असुरों का वध करने के लिए देवी नंदगोप और यशोदा की पुत्री बनकर अवतरित होंगी।
श्रीदुर्गासप्तशती केवल एक ग्रंथ नहीं है; यह जीवन की समस्याओं, आध्यात्मिक साधना, और आत्म-साक्षात्कार की यात्रा का अद्वितीय मार्गदर्शक है। इसकी हर कथा, हर छंद, और हर श्लोक मानव जीवन के लिए एक अनमोल मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है।
समाप्ति
श्रीदुर्गासप्तशती न केवल आध्यात्मिक साधना का ग्रंथ है, बल्कि मानव चेतना को गहराई से प्रभावित करने वाला एक अद्वितीय दस्तावेज़ है। इसकी कथाएँ, छंद, और तांत्रिक व्याख्याएँ हमारी बाहरी और आंतरिक यात्रा को एक नई दिशा प्रदान करती हैं।
श्रीदुर्गासप्तशती में शक्तिमहिमा का ही वर्णन है – इसे शाक्त सम्प्रदाय का अति विशिष्ट ग्रन्थ मानते हैं। आपके स्थूल जगत और आध्यात्मिक जगत में ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो दुर्गापाठ से सिद्ध न हो सके।
Content by: Shri Vidya Practitioners