Sri Suktam: The Secret to Prosperity and a Balanced Life

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भूमिका

‘श्री’ केवल भौतिक समृद्धि तक सीमित नहीं है। यह सुख, शांति, संतुलन और संतुष्टि का प्रतीक है। जैसे किसी वृक्ष की छाया में हर प्रकार के पथिक को शांति और विश्राम मिलता है, वैसे ही ‘श्री’ जीवन के हर क्षेत्र में संतोष और संतुलन का आशीर्वाद देती है। ‘श्री’ का आह्वान केवल धन और वैभव के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवन के लिए किया जाता है जो हर स्तर पर पूर्ण हो।

एक दृष्टांत: जीवन में श्री का महत्व

एक बार एक राजा ने अपने मंत्रियों से पूछा, “श्री का क्या महत्व है? क्या केवल धन से ही इसे मापा जा सकता है?”

मंत्री ने उत्तर दिया, “राजन, धन केवल ‘श्री’ का एक रूप है। ‘श्री’ वह है जो जीवन को पूर्ण बनाती है। यदि धन है, लेकिन स्वास्थ्य नहीं; यदि संपत्ति है, लेकिन परिवार में प्रेम नहीं; तो क्या यह सच्ची समृद्धि होगी?”

फिर मंत्री ने राजा को एक साधारण किसान से मिलवाया, जिसकी झोंपड़ी में सीमित साधन थे, लेकिन उसके चेहरे पर संतोष और प्रसन्नता की चमक थी। वह किसान नित्य श्रीसूक्त का पाठ करता था और कहता था, “मैं हर दिन देवी लक्ष्मी का धन्यवाद करता हूँ कि मेरे पास वह है जो मुझे चाहिए।” यह दृष्टांत समझाता है कि ‘श्री’ का अर्थ भौतिक धन से अधिक है – यह मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक संतुलन है।

‘श्री’ शब्द की व्युत्पत्ति

श्रीसूक्त की तीसरी ऋचा में ‘श्री’ शब्द की व्युत्पत्ति स्पष्ट होती है: “श्रीर्मा देवी जुषताम्

इसका अर्थ है – सुख, शांति, समृद्धि और संतोष की दात्री देवी का मेरे पास आह्वान हो। ‘श्री’ शब्द का यह आह्वान केवल एक वैदिक मंत्र नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं को दर्शाता है। यह पाठ व्यक्ति को याद दिलाता है कि समृद्धि का मार्ग भीतर से प्रारंभ होता है।

धन और समृद्धि का व्यापक दृष्टिकोण

धन केवल मुद्रा, सोने या भूमि तक सीमित नहीं है। इसका मापन जीवन की संतुलित समृद्धि से किया जाना चाहिए। हमारी परंपरा में धन के आठ रूप बताए गए हैं, जिन्हें ‘अष्ट लक्ष्मी’ कहा जाता है। यह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की समृद्धि को दर्शाते हैं:

आध्यात्मिक धन: आंतरिक शांति और ज्ञान।
वैवाहिक सुख: एक संतुलित और प्रेमपूर्ण दांपत्य।
संतान लक्ष्मी: पुण्य संतति का आशीर्वाद।
धन लक्ष्मी: भौतिक समृद्धि।
धैर्य लक्ष्मी: विपरीत परिस्थितियों में साहस और धैर्य।
विद्या लक्ष्मी: विद्या और ज्ञान का भंडार।
विजय लक्ष्मी: संघर्षों में विजय।
आरोग्य लक्ष्मी: स्वास्थ्य और दीर्घायु।

यह दृष्टिकोण हमें याद दिलाता है कि यदि जीवन में किसी भी क्षेत्र में कमी हो, तो वह अधूरा महसूस होगा। इसीलिए, श्रीसूक्त जीवन के हर पहलू में संतुलन और समृद्धि का आह्वान करता है।

श्रीसूक्त: एक वैदिक परिचय

ऋग्वेद और श्रीसूक्त: श्रीसूक्त ऋग्वेद के खिलसूक्तों में से एक है। यह शाकल शाखा के ऋग्वेदसंहिता के खिलसूक्तों के द्वितीय अध्याय का छठा सूक्त है। इसमें 15 ऋचाएं हैं और 16वीं ऋचा फलश्रुति प्रदान करती है। इसके अलावा, 11 परिशिष्ट मंत्र ‘लक्ष्मी सूक्तम’ के नाम से जाने जाते हैं।

यह सूक्त न केवल वैदिक यज्ञों का अंग है, बल्कि इसे गृहस्थ जीवन में भी अपनाया गया है। कहते हैं कि जब महर्षि भृगु ने ध्यान में देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए श्रीसूक्त का उच्चारण किया, तो देवी ने प्रकट होकर उनसे कहा, “जो इस सूक्त को सही स्वर और श्रद्धा के साथ उच्चारित करेगा, उसकी समृद्धि में कभी कमी नहीं होगी।”

स्वर चिह्न और पाठ परंपरा: श्रीसूक्त का पाठ तभी प्रभावी होता है, जब इसे वैदिक स्वर-संस्कार के अनुसार किया जाए। कश्मीरी हस्तलिपियों में इसके पाठ के अलग स्वर-पद्धति के उदाहरण मिलते हैं।

महालक्ष्मी का त्रिगुणात्मक स्वरूप: श्रीसूक्त महालक्ष्मी को त्रिगुणात्मक और परमेश्वरी के रूप में प्रस्तुत करता है:
“सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी।” (श्रीदुर्गासप्तशती, प्राधानिकं रहस्यम्)

यह त्रिगुण – सत, रज, और तम – हमारे जीवन के सभी पहलुओं को नियंत्रित करते हैं। देवी लक्ष्मी इन्हीं तीनों गुणों में संतुलन लाने वाली शक्ति हैं।

एक कहानी: संतुलन का महत्व

प्राचीन समय की बात है, एक व्यापारी देवी लक्ष्मी से नाराज था। उसने कहा, “हे देवी, मैं दिन-रात धन कमाने के लिए मेहनत करता हूँ, फिर भी मैं संतोष का अनुभव क्यों नहीं करता?”

देवी प्रकट हुईं और बोलीं, “तुमने केवल रजोगुण – कर्म – को अपनाया है, लेकिन सतोगुण – ज्ञान और शांति – और तमोगुण – विश्राम – की उपेक्षा की है। जीवन में समृद्धि तभी संभव है, जब ये तीनों गुण संतुलित हों।”

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि देवी लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए जीवन में कर्म, ज्ञान, और विश्राम का संतुलन आवश्यक है। श्रीसूक्त का पाठ इसी संतुलन को स्थापित करने का एक साधन है।

श्रीसूक्त का आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व

शक्ति का रूपांतरण: श्रीसूक्त केवल एक वैदिक मंत्र नहीं है, बल्कि यह हमारी संभावित ऊर्जा को गतिशील ऊर्जा में परिवर्तित करता है। सही स्वर और छंद में श्रीसूक्त का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में मानसिक शांति और भौतिक समृद्धि दोनों आती हैं।

दैनिक जीवन में श्रीसूक्त का उपयोग:

  • सकारात्मक ऊर्जा के लिए: श्रीसूक्त का पाठ सुबह के समय घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करता है।
  • अभिषेक और हवन: यदि इसे हवन में उपयोग किया जाए, तो यह वातावरण को शुद्ध करता है और घर में लक्ष्मी का वास सुनिश्चित करता है।
  • सम्पुट पाठ: श्रीसूक्त का बीज मंत्रों के साथ सम्पुट पाठ इसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।

गलत उच्चारण के परिणाम

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि श्रीसूक्त का अशुद्ध पाठ देवी लक्ष्मी की कृपा को दूर कर सकता है।

श्रीसूक्त का पुराणों में उल्लेख

श्रीसूक्त का वर्णन विष्णुधर्मोत्तर पुराण के द्वितीय खंड में मिलता है। भगवान परशुराम और वरुणपुत्र पुष्कर के संवाद में श्रीसूक्त की महिमा का वर्णन किया गया है।

पुष्कर ने परशुराम से कहा, “श्रीसूक्त का पाठ उस नाव के समान है जो हर तूफान में हमें बचा सकती है। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, यह सूक्त जीवन के हर क्षेत्र में समृद्धि लाने की क्षमता रखता है।”

निष्कर्ष

श्रीसूक्त केवल एक वैदिक मंत्र नहीं है; यह सुख, शांति, समृद्धि और संतोष का मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि समृद्धि का असली अर्थ केवल भौतिक धन में नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन में है। यदि इसे श्रद्धा, सही उच्चारण और समझ के साथ अपनाया जाए, तो यह न केवल भौतिक सुख प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी मार्ग खोलता है।

श्रीसूक्त का पाठ हर मनुष्य के जीवन में एक ऐसा दीपक है जो अज्ञानता के अंधकार को दूर करके ज्ञान और समृद्धि का प्रकाश फैलाता है।

Content by: The Priest Team