गलत उच्चारण के परिणाम: लक्ष्मी की कृपा से वंचित होने का खतरा
हम सभी जानते हैं कि श्रीसूक्त की महिमा अपार है। अगर उसका शुद्ध उच्चारण से पाठ किया जाए तो हमारे जीवन में कभी कोई आर्थिक समस्या नहीं रहती। यही कारण है कि हमारे शास्त्रों में उच्चारण और मंत्रजाप के महत्व को विशेष रूप से बताया गया है। जैसे एक बीज को भूमि में ठीक से बोने पर ही वह अंकुरित होता है, उसी तरह श्रीसूक्त का सही उच्चारण देवी लक्ष्मी की कृपा और आशीर्वाद को हमारे जीवन में आकर्षित करता है। यदि इसका पाठ अशुद्ध होता है, तो देवी लक्ष्मी की कृपा दूर हो सकती है और इसके विपरीत प्रभाव प्रकट हो सकते हैं।
श्रीसूक्त का शुद्ध उच्चारण और उसकी महिमा
श्रीसूक्त का हर एक शब्द, हर एक ध्वनि, देवी लक्ष्मी की कृपा को आमंत्रित करता है। विचार करें, जब हम किसी व्यक्ति से सच्चे मन से बात करते हैं, तो हमारी आवाज़ उसकी आत्मा तक पहुँचती है। इसी तरह, श्रीसूक्त के हर शब्द में गूढ़ शक्तियाँ छिपी हुई हैं। यदि हम उन शब्दों का गलत उच्चारण करते हैं, तो यह जैसे उस व्यक्ति से ग़लत शब्दों का उच्चारण करना हो, जिसके कारण वह व्यक्ति दुखी या नाराज़ हो सकता है। श्रीसूक्त में प्रयुक्त शब्दों की शक्ति भी ठीक वैसी ही है। जब हम उनका गलत उच्चारण करते हैं, तो हम देवी ‘लक्ष्मी’ के स्थान पर ‘अलक्ष्मी’ को आमंत्रित कर सकते हैं, जो जीवन में अराजकता, अभाव, और दुर्भाग्य को लाती है।
गीती शीघ्री शिरःकम्पी यथालिखितपाठकः।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः॥(अगर कोई पाठ करते समय उसको – फिल्मी गीत की तरह पढ़े, जल्दी-जल्दी में पढ़े – अपना सिर हिलाते पढ़े, हाथों से लिखा हुआ पढ़े – उसे लाभ नहीं मिलता।)
लक्ष्मी और अलक्ष्मी
जैसे एक माँ अपने बच्चे से कोई शिकायत नहीं करती, जब वह उसे प्यार से पुकारता है, लेकिन यदि वह बच्चा माँ का नाम गलत पुकारे, तो माँ की आँखों में थोड़ी सी नाराज़गी आ सकती है। वही हाल माँ लक्ष्मी का भी है। अगर हम उनका नाम या शब्द गलत उच्चारण करें, तो उनका आशीर्वाद छिन सकता है। देवी लक्ष्मी इतनी कोमल हैं कि उनके प्रति हर शब्द में श्रद्धा और सही भाव का होना आवश्यक है।
यही बात श्रीसूक्तं में है, लक्ष्मी को अगर अलक्ष्मी कहकर पुकारेंगे तो क्या होगा।
एक समय की बात है, एक साधक ने अपने गुरु से पूछा, “गुरुदेव, क्या सचमुच हमें श्रीसूक्त का उच्चारण शुद्ध रूप से करना ही चाहिए?” गुरु ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “बिलकुल! जैसे तुम अपनी माँ को पुकारते समय एक भी शब्द गलत नहीं बोल सकते, वैसे ही देवी लक्ष्मी के प्रति भी वही ध्यान और सम्मान होना चाहिए।” फिर गुरु ने एक कहानी सुनाई, “एक बार एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ को पुकार रहा था, लेकिन माँ का नाम वह गलत बोल रहा था। माँ ने हंसते हुए कहा, ‘अगर तुम मुझे सही नाम से नहीं पुकारोगे तो मैं तुम्हारी मदद कैसे करूंगी?’ और उसी समय वह बच्चा समझ गया कि शब्द का सही रूप ही वह सीधा रास्ता है, जिससे माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है।”
विद्या और अविद्या
श्रीसूक्त में विद्या और अविद्या का भी गहरा संबंध है। विद्या ज्ञान का प्रतीक है, जो हमें सच्चे मार्ग पर चलने की दिशा दिखाता है। दूसरी ओर, अविद्या वह अंधकार है जो हमें भ्रमित करता है और हमारे जीवन में अशांति और संघर्ष पैदा करता है। अगर हम श्रीसूक्त का अशुद्ध उच्चारण करते हैं, तो हम अविद्या को आमंत्रित कर सकते हैं, जिससे हमारी मानसिक शांति और संतोष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
एक उदाहरण के तौर पर, जैसे एक मूर्तिकार अपने शिल्प में कच्ची या त्रुटिपूर्ण छेनी का इस्तेमाल करता है, तो वह मूर्ति अपनी सुंदरता और सही आकार में नहीं उभरती। उसी प्रकार, अगर हम श्रीसूक्त का अशुद्ध उच्चारण करते हैं, तो उसकी दिव्यता और शक्ति हमारे जीवन में सही रूप से प्रकट नहीं होती।
आधुनिक समय में गलत उच्चारण के प्रभाव
आजकल के तेज़ और भागमभाग भरे समय में हम सब कुछ जल्दी में करने की आदत डाल चुके हैं। हम जब एक ऐप खोलते हैं तो उसे सैकंडों में इस्तेमाल करना चाहते हैं, हम जब कुछ सीखते हैं तो उसे तुरंत समझने की उम्मीद रखते हैं। लेकिन जो चीज़ें जल्दी होती हैं, उनमें अक्सर कोई न कोई कमी रह जाती है। यही हाल श्रीसूक्त का गलत उच्चारण करने से होता है। हम एक चुटकी में परिणाम चाहते हैं, लेकिन बिना सही उच्चारण के, हम केवल धोखा खा सकते हैं।
माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः।
धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः॥(मंत्रों को स्पष्ट बोलना, सही छंद में बोलना, आत्मविश्वास से बोलना, माध्यम गति से बोलना, धैर्यपूर्वक बोलना, लय सहित बोलना, ये अच्छे पाठकों के गुण हैं।)
सोचो, जैसे एक तेज़ दौड़ने वाला व्यक्ति रास्ता भटक जाए और उसे सही दिशा का पता न हो, तो वह कितनी भी तेजी से दौड़े, अंत में वह कहीं नहीं पहुँच पाएगा। आजकल के जेनरेशन की तरह हम भी जल्दी से कुछ पाना चाहते हैं, लेकिन जब सही रास्ता न हो तो सब फिजूल हो जाता है। श्रीसूक्त में हर शब्द की दिशा महत्वपूर्ण है। गलत उच्चारण से हम लक्ष्मी की कृपा की दिशा को नहीं पा सकते, बल्कि हम जीवन में उलझन और परेशानियों में फंसे रह सकते हैं।
तो इसका क्या उपाय क्या हो सकता है?
तो इसका क्या उपाय क्या हो सकता है? जो असरदार भी हो और आपकी पहुँच में भी हो!
श्री आदि गुरु श्री शंकराचार्यजी ने ऐसे भक्तों के लिए एक सरल उपाय बताया है जो श्रीसूक्त का शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाते। उन्होंने श्रीसूक्त की ही एक विशेष नामावली बनाई है, जिसमें श्रीसूक्तं में देवी महालक्ष्मी के जितने भी व्यक्त और अव्यक्त स्वरुप है, उन सभी १५ ऋचाओं की सरल नामावली बनाई है।
यह नामावली न केवल शुद्ध उच्चारण का विकल्प है, बल्कि यह हमें देवी लक्ष्मी की कृपा का सही मार्ग दिखाती है। जैसे एक किसान अपने बीजों को सही मौसम में और सही तरीके से बोता है, ताकि अच्छा फल प्राप्त हो, वैसे ही यह नामावली हमें सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह नामावली उन सभी शक्तियों और कृपाओं को समाहित करती है, जो श्रीसूक्त में निहित हैं।
नामावली की महत्ता
हमारे श्रीयंत्र के साथ आने वाली पूजा पुस्तिका में यह विशेष नामावली सम्मिलित है। यह पुस्तिका न केवल पूजा विधि की मार्गदर्शिका है, बल्कि यह हमारी आस्था और विश्वास को मजबूत करती है। यह सुनिश्चित करती है कि हमारी पूजा और उपासना के प्रयास व्यर्थ न जाएं और हमें देवी लक्ष्मी की कृपा का संपूर्ण लाभ प्राप्त हो।
यह पुस्तिका उन लोगों के लिए एक वरदान है जो श्रीसूक्त का शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते। इसमें हर एक नाम का सही अर्थ भी दिया गया है, जिससे हम देवी से जुड़ने का सही तरीका समझ पाते हैं।
उदाहरण के लिए,
- “श्री अनपगामिन्यै नमः” का अर्थ है, “श्री माता जो कभी अपने बच्चों को नहीं छोड़तीं”
- “श्री तर्पयन्त्यै नमः” का अर्थ है, “श्री माता, जो अपने बच्चों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करतीं हैं।”
निष्कर्ष
आखिरकार, श्रीसूक्त का सही उच्चारण अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि यह संभव न हो, तो हमें श्री शंकराचार्यजी द्वारा प्रदत्त नामावली का ही उपयोग करना चाहिए। यह देवी लक्ष्मी की कृपा को हमारे जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि के रूप में लाने का सर्वोत्तम उपाय है।
आप सभी से निवेदन है कि इस दिव्य कार्य में शुद्धता और श्रद्धा से भाग लें, ताकि देवी लक्ष्मी की अनंत कृपा आपके जीवन में बनी रहे।
Content by: The Priest Team